ये भीगे खून से कपडे , ये भीगी आँख का पानी
इसी माहौल से गुजरा जमाना और क्या होगा? .
ये मंदिर और ऊँचा कर ये मस्जिद और फैला दो
न टूटी गर जो दीवारें बहाना और क्या होगा ?
तन पे कपडे थोड़े हों निगाहें घूरती हैं
जो तन पूरा ढका हो निगाहें चीरती हैं
निगाहें साथ चलती हैं हजारों में जहाँ जाऊ
मै तुमसे पूछ्ती मर्दों दिखाना और क्या होगा ?
ये भीगे .............
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