Thursday, February 24, 2011

usne

बड़ी साफगोई से पुकारा उसने 
लगा की कान्हा पुकारा उसने
सूर्य भी बस एक टक तकता रहा 
जब कभी रेशमी जुल्फों  को संवारा उसने
चौदह दिन लगे बस चाँद को पिघलने में
जिस दिन से मेरे चाँद को निहारा उसने 
रस्मन जो मुझे  देख के मुस्काई वो 
लगा की फिर कोई किया है इशारा उसने
और यूँ ही नहीं है मेरी चाल का मतवालापन   
किसी से जिक्र किया है हमारा उसने

Armaan

दूर बैठ कर वीरानों में 
तन्हाईयों से तंग-सा हो
मत खींच नक्शे बेतरतीब 
मेरी कठोर-सी दिखने वाली शक्ल के 
दिमागी कसरत कर 
मेरे प्रतिबिंब के होंठों को चला 
मेरे मुंह से तुगलकी फरमान मत सुन 
मेरे पास आ कर बैठ फुर्सत से  कभी
और इस पत्थर को पिघलते हुए गौर से देख 
यह पत्थर कब से दिल में कुछ अरमान लिए बैठा है
दो कान ढूंढता है दास्तान लिए बैठा है
  
 

kashmakash

कहता है मेरी शर्म -ओ-हया का कायल है ,
फिर क्यूँ बेशरम होने की बात करता है .
वादा करता है मुझसे हाथ मेरा थामेगा,
फिर क्यूँ मेरे कंधे पे हाथ रखता है .
मेरी सादगी भी है पसंद उसको,
फिर  क्यूँ  मुझसे  उलझी सी बात करता है .
ढलते सूरज की कशिश है जिसमे दिलचस्पी है ,
 देरियां  कर क्यूँ रोजाना वो रात करता है.
प्यार वो है जो की  अब तक वो मुझसे करता है ,
या प्यार वो है जो वो करने की बात करता है .